एक छोटे से गाँव में आरव नाम का दस साल का बच्चा रहता था। आरव बहुत समझदार और दयालु था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी खासियत थी—वह मुश्किल समय में घबराता नहीं था। गाँव के पास एक घना जंगल था। लोग उस जंगल में जाने से डरते थे, क्योंकि वहाँ रास्ते बहुत उलझे हुए थे और शाम होते ही चारों तरफ अंधेरा छा जाता था। एक दिन गाँव में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश के कारण गाँव के पास बहने वाली छोटी नदी का पानी बढ़ गया। उसी समय आरव ने देखा कि उसका छोटा दोस्त मोहन जंगल की ओर चला गया था और अभी तक वापस नहीं आया था। मोहन की माँ रोते हुए लोगों से मदद माँगने लगी। कई लोग जंगल में जाने से डर रहे थे। आरव ने कहा, “मैं मोहन को ढूँढकर लाऊँगा।” एक बुजुर्ग ने उसे समझाया, “बेटा, जंगल में जाना खतरनाक है। अकेले मत जाना।” आरव बोला, “मैं अकेला नहीं जाऊँगा। आप मेरे साथ चलिए। हम सावधानी से मोहन को ढूँढेंगे।” आरव और गाँव के कुछ लोग हाथों में टॉर्च लेकर जंगल की ओर चल पड़े। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें कीचड़ में छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए। आरव ने कहा, “ये मोहन के पैरों के निशान हैं। हमें इसी रास्ते पर जाना चाहिए।” कुछ देर बाद उन्हें एक छोटी सी आवाज सुनाई दी। “बचाओ... कोई है?” आरव ने आवाज की दिशा में देखा। एक पेड़ के पास मोहन का पैर एक झाड़ी में फँसा हुआ था। वह डर के कारण रो रहा था। आरव ने तुरंत उसे शांत किया और कहा, “डरो मत मोहन, हम तुम्हें घर लेकर जाएंगे।” आरव ने झाड़ी को सावधानी से हटाया। गाँव के लोगों ने भी उसकी मदद की और कुछ ही देर में मोहन को बाहर निकाल लिया। लेकिन वापस लौटते समय नदी का पानी रास्ते में फैल चुका था। सभी लोग चिंतित हो गए। आरव ने आसपास देखा। उसे थोड़ी दूर एक ऊँचा पत्थरीला रास्ता दिखाई दिया। उसने कहा, “हम इस रास्ते से चलेंगे। यहाँ पानी कम है।” सब लोग धीरे-धीरे उस रास्ते से आगे बढ़े और सुरक्षित गाँव पहुँच गए। मोहन की माँ ने आरव को गले लगाकर कहा, “बेटा, तुमने आज मेरे बच्चे की जान बचाई है।” गाँव के बुजुर्ग ने मुस्कुराकर कहा, “आरव ने हमें एक बात सिखाई है—साहस का मतलब खतरे में बिना सोचे कूदना नहीं, बल्कि समझदारी और सावधानी से मुश्किल का सामना करना है।” उस दिन से गाँव के सभी बच्चे आरव को अपना आदर्श मानने लगे। कहानी की सीख सच्चा साहस डर का न होना नहीं है। सच्चा साहस डर के बावजूद सही काम करने और दूसरों की मदद करने में है...
